Haldi custom in uttarakhand garhwal

 

विवाह जीवन का ऐसा पढाव जहाँ कई सारे रीति रिवाज , रस्में व परम्पराए होती है तो हर धर्म, भाषा के लोगों की विवाह व उससे जुडे कई तौर तरीक़े रीति रिवाज होते है। उसी प्रकार इस लेख में उत्तराखंडी विवाह से जुड़ी कुछ विशेष बातो को लिखा गया है। जो की हर उत्तराखंडियों के विवाह में नज़र आती है।

#माँगलगीत व मंगलस्नान

उत्तराखंडी विवाह में विवाह के पूर्व मंगलस्नान की परंपरा है जिसमें सर्वप्रथम श्री गणेश की पूजा की जाती है फिर वर हो या वधु दोनो पक्षो में हल्दी की रस्म होती है। जिसमें वर वधुओं को विवाह के पूर्व हल्दी व चावल के मिश्रण को पिस कर लेप लगाया जाता है ऐसा कहा जाता है इस लेप से वर वधु के रूप में निखार आता है साथ ही साथ माँगल गीत गए जाते है जो की उत्तराखंड के ही पारम्परिक गीत होते है व उत्तराखंडी पारम्परिक वाद्ययंत्र (ढोल-दमो) बजाए जाते है।

traditional uttarakhand wedding

 

#उत्तराखंडी आभूषण

उत्तराखंडी विवाह में वधु के कुछ विशेष आभूषण होते है जिसे विवाह में पहनना अनुवार्य होता है उन आभूषणो के नाम इस प्रकार है लाल साडी, नथुली (नथ), बुलाक, पोंछी, गुलबंद (हार), मुकुट इत्यादि कुमाऊँ में विवाह के शुभ अवसर पर पारम्परिक पोशाक पहनी जाती है जिसे पिछौडा कहा जाता है। इसके अलावा हँसुली यह एक चाँदी का ज़ेवर हुआ करता है जो की महिलायें गले में पहनती है संपन्न वर्ग की महिलायें इसे सोने की भी बनवाती है। ‘मूर्खालास’ यह चाँदी की बालियाँ हुआ करती है जिसे महिलाएं कानों के ऊपरी भागों में पहना करती है। धागुली’ इसे स्त्री व पुरुष दोनो ही हाथो में पहना करते है।

#विवाह में उत्तराखंडी खानपान

विवाह में खानपान व पकवान की पूर्व तैयरीयो में जो मुख्य उत्तराखंडी पकवान है उसका नाम है आरसा जो की चावल और गुड का बनाया जाता है इसे गाँव के स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाया जाता है। साथ ही इसे वधु की विदाई में मायक़े की मीठी याद के तौर पर भेंट दी जाती है इसे विवाह के पश्चात पूरे गाँव, रिश्तेदारो व बरातियों में बाँटा जाता है साथ ही काली दाल से बनी पकोड़ियो का भी अपना ही मज़ा व स्वाद है। इसके साथ ही भड़ू के बड़े से बर्तन पर पहाड़ी दाल बनाई जाती है व चावल (भात) के साथ सभी को परोसा जाता है। आज भी कई गाँवों में विवाह के भोज को खेतों में बैठा कर खिलाया जाता है जिसका अपना ही मज़ा है।

how people have food in uttarakhand marriage

 

#उत्तराखंडी वादय व वादकों की भूमिका

बिना उत्तराखंडी वादय के उत्तराखंडी विवाह अधूरा प्रतीत होता है क्यूँकि की जब तक उत्तराखंडी विवाह में उत्तराखंडी पारम्परिक वादय ढोलदमों, रणसिंघा, मशकबाज़ू  की धुनो ना सुनाई दे बिना विवाह का माहोल रंगमय प्रतीत नहीं होता। औजियों (बाज़गीयों) द्वारा बजाए जाने वाले ये पारम्परिक वादय शुभकार्यों में एक विशेष भूमिका निभाते हैं, तो औजियों द्वारा अलग-अलग शुभकार्ययों  में अलग-अलग धुने बजाई जाती है जैसे की शादियों व मंगलस्नान में बढ़ेल ताल बजाई जाती है तो वही बारात प्रस्थान के समय रेहमानी ताल बजाई जाती है।

Doli vidai custom in uttarakhand

 

#डोली में की जाती है वधु की विदाई

आज भी उत्तराखंड में विवाह के पश्चात वधु की विदाई डोली में बैठकर ही की जाती है। डोली को वधु के भाई या मामा द्वारा उठाया जाता है। डोली को विशेष रूप से तैयार करवाया जाता है जो की पूरी तरह से लकड़ी से बनाई जाती है।

यदि आप लोग भी कभी उत्तराखंडी विवाह में सम्मलित हुए है तो अपना अनुभव ज़रूर बाँटे। 🙏🏻धन्यवाद 🙏🏻