उत्तराखंड ना केवल देवभूमि बल्कि ऐसे कई तथ्यों के लिए प्रसिदध है जिनके बारे मे जान कर हर एक उत्तराखंडी को गर्व महसूस होता है और आज हम इस लेख के माध्यम से ऐसे ही एक शख्श के विषय मे लिख रहे हैं जिनके कार्यों व बलिदान के लिए उत्तराखंड का हर एक व्यक्ति हमेशा उनका एहसान-मंद रहेगा, जी हाँ कुछ ऐसे ही थे हमारे स्वर्गीय उत्तराखंडी सपूत श्री देव सुमन जी

#पारिवारिक परिचय

श्री देव सुमन जी का जन्म २५ मई १९१६ को टिहरी जिले के ‘बमुँड जौल’ नाम गाँव मे हुआ था। इनके पिता का नाम ‘श्री हरिदत्त बड़ोंनी’ था जो की पेशे से वैध्य हुआ करते थे। माता का नाम ‘तारादेवी’ जो की एक सकुशल गृहणी थी। श्री देव सुमन पर अपने माता पिता के आदर्शों व संस्कारों का ऐसा प्रभाव पड़ा की यह मामूली सा इंसान समाज के हित व अपने आदर्शों के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर चला। इलाक़े में फैले हैज़े के रोगियों की सेवा मे श्री देव सुमन जी के पिता ने निस्वार्थ भाव से सेवा की और सेवा के दौरान स्वयं भी हैज़े की शिकार हो जाने के कारण ही मात्र ३६ वर्ष की आयु में श्री हरि दत्त बड़ोनी जी की मृत्यु हो गई। इसके पश्चात परिवार की पूरी ज़िम्मेदारी उनकी माता के कन्धों पर आ गई। अपनी ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी समझते हुए श्रीमती तारा देवी जी ने परिवार का पालन-पोषण किया।

#शिक्षा व स्वाधीनता के प्रति रुचि

श्रीदेव सुमन जी का असल नाम श्री ‘दत्त बड़ोनी’  था पर बाद मे उन्हें श्री देव सुमन कहा जाने लगा। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अपने ही गाँव मे व चम्बाख़ाल नामक स्थान के विद्यालयों मे हुई। वर्षें १९३० में उन्हें किसी कारणवश देहरादून जाना पड़ा जहाँ वे सत्याग्रहियों से प्रभावित हो कर उनके दल मे शामिल हो गए। सत्याग्रहियों से जुड़े होने के कारण उन्हें बंधी बना कर जेल भेज दिया गया फिर १०-१५ दिनों मे उन्हें जुर्माने के साथ रिहा कर दिया गया। इसके पश्चात वर्ष १९३१ में उन्होंने देहरादून के नैशनल हिंदू स्कूल मे अध्यापक के रूप मे काम करना शुरू किया व साथ ही उन्होंने अपना अध्ययन भी जारी रखा। वर्ष १९३१ मे ही अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने हिंदी मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की फिर पंजाब विश्वविध्यालय से ‘रत्न भूषण’ व ‘प्रभाकर’ की परीक्षा उत्तीर्ण की तत् पश्चात उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन व विशारद जैसी ‘साहित्य रत्न’ जैसी कई परीक्षाए भी अपनी कठोर परिश्रम से उत्तीर्ण की।

 

#स्वाधीनता संग्राम का सफ़र व दुखद अंत

श्री देव सुमन जी गाँधी जी के अनुयायी थे। गाँधी जी के विचारों से वे इस क़द्र प्रभावित थे की वे भी अहिंसक रूप से अपनी क्रूर प्रजासत्तको के विरूध लड़ाई लड़ना चाहते थे उस दौरान टिहरी के क्रूर राजा द्वारा चलाई जा रही (बोलांदा बद्री) शासन के विरूध उन्होंने आवाज़ उठाई थी। जिसके लिए राजा द्वारा ३० दिसम्बर १९४३ को उन्हें बंधी बना कर गिरफ़्तार करवाया गया। जेल मे मिल रहे कंकड़ व रेत मिश्रित खाने के ख़िलाफ़ मई १९४४ में श्रीदेव सुमन जी ने जेल में अन्नसन शुरू किया। यह अन्नसन पूरे २०९ दिनों तक चला इस बीच जेलर मोहन सिंह द्वारा श्री देव सुमन जी को कई यातनायें दी गई कई बार उनका अन्नसन बाधित करने का प्रयास किया गया और ८४ दिनों तक समाज व भलाई के अधिकार  के लिए अहिंसक रूप से लड़ते लड़ते श्री देव सुमन जी ने २५ जुलाई १९४४ को जेल मे दम तोड़ दिया। राजा व जेलरों की क्रूरता इतनी की उन्होंने इस अमर वीर सेनानी के पृथक शरीर को रातों-रात भिलंगना नदी में बहा दिया। इस उत्तराखंड के अमर वीर सपूत के बलिदान इतिहास के पन्नो में हमेशा के लिय दर्ज हो गया ऐसे वीर सपूत को कोटि कोटि प्रणाम।

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