रूपकुंड जिसे मुर्दा और कंकालों का कुंड भी कहा जाता है। यह कुंड ना केवल अपनी सुंदरता बल्कि मुर्दों के कुंड जैसी रहस्यमय इतिहास के लिए भी चर्चित है। तिब्बत सीमा के पास हिमालय की गोद में बसा रूपकुंड का इतिहास आज से कई वर्षों पुराना है और इसके इतिहास के विषय में जानकारो और विशेषज्ञों द्वारा कई बातें कही जाती रही है परंतु वास्तविकता यह है की आज भी इस कुंड के विषय में सही जानकारी किसी जानकार के पास नहीं है इसलिए यह कुंड आज भी रहस्यमय तथ्यों की सूची में गिना जाता है।

#रूपकुंड का इतिहास

स्थानीय लोगों के अनुसार इस कुंड का निर्माण संसार के रचियता भगवान शिव ने अपनी अर्धागनी पार्वती ( नंदा ) के   लिए करवाया था। कहा जाता है जब माता पार्वती ( नंदा/ गौरा ) अपने मायक़े से अपने ससुराल हिमालय जा रही थी तब रास्ते में उन्हें प्यास लगी उन्होंने शिव से पानी की इच्छा ज़ाहिर की शिव ने उसी जगह पर अपने त्रिशूल से कुंड का निर्माण कर दिया और जब माता गौरा कुंड में पानी पीने गई तब माता के पानी में पढ़ते सुंदर प्रतिबिम्ब को देखते हुए शिव द्वारा इस कुंड को रूपकुंड नाम दिया गया। आज भी उत्तराखंड के स्थानीय लोगों द्वारा जब भी नंदा देवी राज़जात यात्रा की जाती है तो यह यात्रा रूपकुंड पर अवश्य रूकती है और श्रधालुओ द्वारा कुंड के पास रुक कर माता की डोली का शृंगार व विश्राम किया जाता है।

#मुर्दा/ कंकालों का कुंड कहे जाने का कारण                                                                                                

हिमालय के बीच लगभग ५००० फ़ीट से भी की ऊँचाई पर बसा रूपकुंड यू तो साल के अधिकतर महीने बर्फ़ से ढका होता है परंतु साल के कुछ सबसे ग़र्म महीनो में यहाँ की बर्फ़ पिघलने लगती है। इस दौरान इस कुंड के तलहटी व आसपास १०-२० नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में नर कंकाल दिखाई देते है। विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यह संख्या ५०० या इससे अधिक भी हो सकती है। इस विषय में सर्वप्रथम वर्ष १९४२ में वन विभाग द्वारा किसी दुर्लभ फूल की खोज में आए कुछ अधिकारियों को इन नर कंकलो की प्राप्ति हुई। जिसकी जानकारी उन्होंने अन्य विशेषज्ञों व वैज्ञानिको को दी। जानकारो का मानना है कि पानी का स्तर कम होने पर कुंड की सतह व आसपास कई तादाद में नर कंकाल के अवशेष बिखरे पड़े मिलते है।

#खोज में कुंड से मिले अवशेष

रूपकुंड की खोज के दौरान विशेषज्ञों व खोजकर्ताओं को कई ऐसे सबूत व अवशेष मिले है जिनकी गूँथी आज भी पूर्ण रूप से सुलझी नहीं है। लन्दन ऑक्स्फ़र्ड यूनिवर्सिटी की खोज में वैज्ञानिको व खोजकर्ताओ को रूपकुंड से मिले अवशेष से यहाँ पता चला की यहाँ कंकाल लगभग १२०० वर्ष से भी अधिक पुराने है। इन अवशेष में खोजकर्ताओं को कंकालों के अलावा कुछ अन्य वस्तुयें भी प्राप्त हुई वे इस प्रकार की है नाख़ून, मांस के टुकड़े, बाल, हत्थार, गहने इत्यादि

 

#विशेषज्ञो के कत्थ व अनुमान

विशेषज्ञों के अनुसार इस कुंड में इतनी बड़ी संख्या में कंकालो की मौजूदगी का कारण द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के पश्चात जापानी फ़ौजी हिमालय की चोटी से गुज़रे होंगे उसी दौरान वह हुई औलावृष्टि के कारण उन सभी फ़ौजियों की मौत हुई होगी। तो अन्य कत्थको यह भी माना गया है की कनौज के राजा द्वारा अपनी पत्नी, बच्चे व प्रजा के साथ नंदा माँ की पूजा के लिए जाया जा रहा था उसी दौरान हुई औलावृष्टि में उन सभी की मौत हो गई होगी। वास्तविकता में अभी भी कई सवाल अनसुलझे है इसलिए भी रूपकुंड का इतिहास रहस्यमय बना हुआ है। उम्मीद है भविष्य में रूपकुंड से जुड़े सभी अनसुलझे सवालों का जवाब हमारे समक्ष होगा।

यदि आपने भी रूपकुंड की यात्रा की है तो अपना अनुभव ज़रूर बाँटे।।🙏🏻धन्यवाद 🙏🏻