jaunsar bawar folk dance

 

रामलीला व पांडव नृत्यों के बारे में हर वो व्यक्ति जनता होगा जिसने अपना जीवन उतराखंड की सुंदर वादियों अनेको रीति रिवाजो, सुंदर परंपराओं व संस्कृति के बीच बिताया हो और हम में से ही कई लोगों ने गाँव में होने वाले इन एतिहासिक व पौराणिक कार्यक्रम रामलीला व पाण्डव नृत्य में भाग भी लिया होगा इन कार्यकर्मों से संबंधित कुछ विशेष बातें इस प्रकार है।

#पाण्डवो की उपासना

शास्त्रो से यह ज्ञात होता है की जब पाण्डवो को वनवास की सज़ा दी गई उस वक़्त उन्होंने अपनी यह सज़ा उत्तराखंड के जंगलों में ही काटी थी और उत्तराखंड के जौनसार इलाक़े के राजा विराट ने उन्हें अपने इलाक़े में शरण दी थी इस कारणवस जौनसार के लोग आज भी पाण्डवो की उपासना करते है। हिंदुओ के प्रमुख तीर्थ स्थल बद्रीनाथ , केदारनाथ व पंच केदार के अंश तुंगनाथ, मध्यमेश्वर , रूद्रनाथ व कल्पेश्वर जैसे मंदिरो का निर्माण भी पाण्डवो ने ही किया है।

#रामलीला व पांडव नृत्य कार्यक्रम आयोजन का कारण 

Pandav Dance Performance villagers

उत्तराखंड के लगभग हर एक गाँव में कभी ना कभी रामलीला का आयोजन हुआ करता था। मुख्यतः रामलीला कार्यक्रम का आयोजन जून के माह में हुआ करते था तो पाण्डव नृत्य शीत माह में आयोजित किए जाते थे। गाँव के स्थानीय लोग इन कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया करते थे। यह कार्यक्रम एक रूप से मनोरंजन के साधन भी थे। आज से १५ – २० वर्ष पूर्व आधुनिक सुविधा ( टेलीविजन, कम्प्यूटर , मोबाइल ) के अभाव में उत्तराखंड के ग्रामीणो लोगों के लिए यह एक आस्था के साथ साथ मनोरंजन का भी साधन था इसलिए रामलीला व पांडवों की कथा के अलग अलग किरदारों को अलग अलग अभिनयकर्ता द्वारा दर्शाया जाता था। मनोरंजन के साथ साथ ये कार्यक्रम दर्शकों को जीवन के अनेक पाठो की सीख दे जाते थे तो किस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत ही होती है इन बातों का बोध भी हमें ये कथायें करवाते आए है परंतु इन सभी कार्यों में एक बात जो सामान्य नज़र आती है वो है मनुष्य को सदाचार का पाठ सिखाना तथा भूतकाल में हुई ग़लतियों से सबक़ ले कर उन ग़लतियों को दुबारा दोहराने से बचाना।

#सभी पत्रों के अभिनयकर्ता केवल पुरुष

आज से कुछ वर्षों पूर्व तक हमारा समाज लगभग पूर्णता पुरुष प्रधान हुआ करता था उस समय स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में ज़्यादा अधिकार नहीं हुआ करते थे तो स्त्रियों के लिए कुछ सीमायें निश्चित की गई थी और उन्हें उन दायरों में ही रहना पढ़ता था। उत्तराखंड में भी उस समय स्त्रियों को अभिनय करने की अनुमति नहीं हुआ करती थी इसलिए पुरुषों द्वारा ही स्त्री, पुरुष दोनो के किरदार निभाए जाते थे परंतु अब स्त्रियाँ भी अपनी इच्छा अनुसार इन कार्यक्रमों में सहभागी होती है और बख़ूबी अपना किरदार निभाती है।

Pandav Dance performance

 

#आज भी आयोजित की जाती है रामलीला व पांडव नृत्य

उत्तराखंड के कई गाँवों में आज भी रामलीला व पांडव नृत्य जैसे कार्यक्रम किए जाते है रामलीला के माध्यम से रामायण तो पांडव नृत्य के माध्यम से महाभारत को दर्शया जाता है। रामलीला द्वारा श्री राम के जीवन से जुडे हर पहलू को दर्शाया जाता है तो पाण्डव नृत्य कार्यक्रम के माध्यम से पंच पाण्डवो व द्रोपती की पूजा अर्चना करने की परम्परा वर्षों से उत्तराखंड में चलती आ रही है । वही  उत्तराखंड संस्कृति के विशेष अंग औजियो द्वारा बोले जाने गीतों व बजाए जाने वाले ढोलों के साथ पाण्डवो का नृत्य शुरू होता है।

कृपया अपनी प्रतिक्रिया एवं  राय नीचे COMMENT के माध्यम से अवश्य दें एवं अपने मित्रों के साथ SHARE करें।  🙏🏻धन्यवाद 🙏🏻

 

Sharing is caring!