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photo credit – Pandavaas creations.

उत्तराखंड में ऐसी कई परम्परा व त्योहार है जो लगभग ख़त्म होने की कगार पर है, तो कई समाप्त हो चुके है जो की हर एक उत्तराखंड संस्कृति प्रेमी के लिए चिंता का विषय है। इन ही त्योहारों व परंपराओं में से एक है ‘फुलारी’ अथवा ‘फूलदेई’ परम्परा जिसके बारे में श्याद आज  की उत्तराखंड युवा पीढ़ी अवगत ना हो परंतु इस शब्द से उत्तराखंड की एक प्राचीन परम्परा जुड़ी है जो कई वर्षों से चली आ रही है। फुलारी क्या है? इससे जुड़ी परम्पराए क्या है? इस विषय में बताने का प्रयास इस लेख द्वारा किया गया है।

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#फुलारी का अर्थ

चैत का महीना जिसे हिंदू पंचाग के अनुसार अप्रैल का महीना कहा जाता है। इस चैत के महीने में उत्तराखंड के जंगलो में कई प्रकार के फूल खिलते है ये फूल इतने मन मोहक व सुंदर होते है कि जिनका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। उन फूलो में से कुछ के नाम कुछ इस प्रकार है – (कुजु ,फ्योलि, बुरांस, बासू, डंडोलि, गुर्याल, बिराली, लई, माल्टा, हिन्सर, किंगोड, आरु, खुमानी) इस प्रकार कई प्रजाति के फूल और फल इस महीने में खिलते है। उत्तराखंड में चैत के महीने की शुरूवाती दिनो से ही गाँव की छोटी छोटी कन्याए इन फूलो को खेतों से तोड़ कर एकत्र कर ले आती है व उन कन्याओ द्वारा ये फूल सर्वप्रथम देवी देवताओं को समर्पित किए जाते है। इसके पश्चात कन्याए अन्य फूलो को गाँव के हर घरों के दरवाज़ों पर रखती है। इन कन्याओ को ही उत्तराखंड में फुलारी कहा जाता है। एक रूप से इसके पीछे यह मान्यता है की प्रकृति ईश्वर की देंन है इसलिए प्रकृति की देन इन फूलो को ईश्वर को समर्पित किया जाए और जिस प्रकार सुंदर व सुगंधित फूल मन को प्रसन्न कर देते है उसी प्रकार इन फूलो के माध्यम से गाँव का सारा वातावरण प्रसन्न व सुगंधित किया जाए। उत्तराखंड में इन छोटी कन्याओ को देवी का रूप भी माना जाता है इसलिए इसे ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में भी गाँव के घरों के हर दरवाज़ों पर रखा जाता है।

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#फुलारीयों की दक्षिणा

चैत (अप्रैल) का माह समाप्त होने के पश्चात फुलारीयों को स्थानीय लोगों द्वारा दक्षिणा (उपहार) के रूप में अनाज, पैसे दिए जाते है।

#संक्रांत पर्व

फुलारी के साथ ही साथ संक्रांत पर्व भी उत्तराखंड  संस्कृति का मुख्य अंश माना गया है। संक्रांत पर्व अर्थात हर महीने (गती) के शुरू होते ही औजियो द्वारा गाँव के प्रत्येक़ घरों में जा कर परंपरिक वाद्य(नपत) ढोल नगारे बजाए जाते है। वही बदले में स्थानीय ग्रामीणो द्वारा औजियों को अनाज, पैसे उपहार के तौर पर दिए जाते है।

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#उत्तराखंड में वर्तमान स्तिथी

अफ़सोस की बात है जिस उत्तराखंड की इतनी सुंदर संस्कृति व परंपरा है वहाँ की वर्तमान स्तिथी यह है की वहाँ के लगभग अधिकतर घरों में ताले लग चुके है लोग पलयान हो कर शहरों में बस चुके और फुलारीसंक्रांत से जुड़ी हमारी यह संस्कृति भी उन बंद घरों के साथ कही अंधेरो में लुप्त होती जा रही है। अपनी उत्तराखंड से जुड़ी संस्कृति व परंपराओं को सजो कर रखना हर उत्तराखंडी की ज़िम्मेदारी है। उम्मीद है आप भी अपनी संस्कृति को संभाल कर रखेंगे व आने वाली उत्तराखंडी पीढ़ी को भी इससे अवगत करवाएगे।

पंडवास क्रीएशन द्वारा फ़िल्माया गया ‘फुलारी’ गीत उत्तराखंड की संस्कृति व उत्तराखंड स्तिथी को बख़ूबी बयान करती है।

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