किसी ने ख़ूब ही कहा है कोशिश करते रहने वालों की कभी हार नहीं होती। ‘मनीष रावत’  कुछ वर्षों पूर्व तक ये केवल नाम ही था परंतु हम में से बहुत ही कम लोग जानते है की इस नाम को पहचान मिलने तक का सफ़र कितना संघर्षिल व कठिन रहा है। मनीष ने ना केवल उत्तराखंड बल्कि हमारे देश को भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरान्वित किया है।

५ मई १९९१ को उत्तराखंड के चमोली जिले मे जन्मे २५ वर्षीय ‘मनीष रावत’ आज सभी उत्तराखंडियों  के लिए एक आदर्श बन चुके है परंतु सफलता का ये सफ़र इतना आसान नहीं था। जब वर्ष २००२ में मनीष के पिता की मृत्यु हुई उस वक़्त मनीष की आयु १० वर्ष थी । अकेले चार बच्चों के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी इनकी माँ के कंधों पर आ चुकी थी। परिवार के पालन पोषण के लिए माँ खेतों में कठिन मेहनत किया करती व मनीष भी माँ की मदद हेतु खेतों में माँ का हाथ बँटाते व उसके पश्चात ७ किलोमीटर की पैदल दूरी तय करते हुए विद्यालय जाया करते थे। घर के हालातों को सुधारने के लिए वर्ष २००६ में मनीष ने चमोली ज़िल्हे के हीं सत्तार स्थान पर एक रेसत्तरा में वेटर के तौर पर अंशक़ालीन नौकरी करनी शुरू की परंतु इस नौकरी से मिलने वाली कम वेतन से परिवार का पालन पोषण कर पाना मनीष के परिवार के लिए मुश्किल  सा था। इसके बाद उन्होंने कई और काम भी किए इस मुश्किल  समय में मनीष ने यह निर्णय लिया यदि ऐथ्लेटिक (Athletic) में उनका चुनाव हो जाए तो उन्हें सरकारी नौकरी प्राप्त हो सकती है व इससे परिवार के हित में भी आर्थिक समस्याएँ कम करी जा सकती है। यही सोच पर ध्यान केंद्रित करते हुए मनीष ने रेसवाकर (race-walker) बनने का निर्णय लिया।

 

  रेस्वकिंग  (race-walking) खेल एक लम्बी दूरी का अनुशासित खेल के रूप में जाना जाता है इस खेल के प्रतिभागी को  एक अनुशासित मुद्रा में दौड लगानी होती है जो की दिखने में हास्यास्पद प्रतीत होती है। इस दौड़ के नियम के अनुसार प्रतिभागी का एक पैर हमेशा ज़मीन पर होना चाहिए जो की बड़ा ही दर्दनीय दौड़ प्रतीत होती है। वे रोज़ाना प्रातः काल ४ बजे उठ कर दौड़ लगाया करते । मनीष द्वारा किए जा रहे अभ्यास का कई बार ग्रामीणो द्वारा मज़ाक़ भी उड़ाया जाता था परंतु उन्होंने ने किसी बात की परवाह ना करते हुए अपना प्रयास निरंतर जारी रखा कई बार उन्हें खेल सम्बंधित सुविधाओं के अभाव का  सामना करना पड़ा परंतु वे अपने प्रयास में लगे रहे और इसी कठिन परिश्रम के पश्चात मनीष ने २० किलोमीटर प्रतियोगिता की दौड पूरी की व १३ वे स्थान पर आए इतना ही नहीं इस प्रतियोगिता में उन्होंने ४ ऐसे प्रतिभागियों को पीछे छोड़ा जो की पूर्व विश्वविजेता रह चुके है। यह दौड़ उन्होंने १ घंटे २१ मिनट २१ सेकेंड में पूरी की व मात्र ३० सेकेंड के विलम्ब के कारण वे देश कि लिए कांस्यपदक लेने से चूक गए परंतु हमें पूरा विश्वास है भविष्य में मनीष का यह परिश्रम देश के नाम पदक ज़रूर हासिल करवाएगा।

 

वर्तमान समय में उत्तराखंड सरकार द्वारा मनीष को उत्तराखंड पुलिस में नियुक्त किया गया है ।उत्तराखंड सरकार से हमारा यही निवेदन है की हमारे ऐसे प्रतिभवी खिलाड़ियों को आगे सुनहेरे भविष्य के लिए पूरी सहायता की जाए ताकि भविष्य में वे अपने देश का नाम गर्व से ऊँचा कर सके।

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