kandali leaves

 

बिछु घास  जिसे अंग्रेज़ी में  ‘Urtica Dioica’ कहा जाता है। बिछु घास को उत्तराखंड में अलग अलग नाम से जाना जाता है, हिंदी में बिच्छुघास/बिच्छू-बूटी, गढ़वाल मे कंड़ाली तो कुमाऊँ मे इसे सियूँण कहा जाता है। जिन पहाड़ी इलाक़ों में २५ डिग़्री सेल्सियस तक तापमान होता है ये घास उन इलाक़ों में पाए जाते है। उत्तराखंड में बिछु घास से साग बनाया जाता है। बिछु बूटी के स्वस्थवर्धक भी कई फ़ायदे है इसके साथ ही कई रोगों की औषधि के रूप में भी इसका उपयोग किया जाता है।

#बिछु घास की संक्षिप्त जानकारी

बिछु घास ठंडे व पहाड़ी इलाक़ों में पाया जाता है। जिन इलाक़ों का तापमान २५ डिग़्री सेल्सियस तक होता उन इलाक़ों में बिछु घास पाई जाती है। बिछु घास की लम्बाई ज़मीन से १ से २ मीटर (३ से ७ फ़ीट) होती है। इसकी हरी पत्तियाँ ३ से १५ सेम्टीमीटर (१ से ६ इंच) लम्बी होती है। मुख्यतः यह घास सर्दियों में उगती है और गर्मियों में झड़ कर गिर जाते है। उत्तराखंड में यह घास जहाँ कहीं आसनी से नज़र आ जाती है। इस घास की डंठल व पत्तियों पर नुक़िले कांटे होते हैं जिसके कारण इसे पहचानना आसान हो जाता है।

kandali#क्यों कहा जाता है बिछु घास

इस घास की पत्तियों व डंठल मे तेज़ व नुक़िलेदार कांटे होते हैं। यदि ग़लती से भी हाथों से इसे स्पर्श कर लिया जाए तो हाथो मे झनझनाहट व असहनीय दर्द होने लगता है अनुभवियों के मुताबिक़ इस दर्द का आभास किसी बिछु के काटने से कम नहीं होता और कुछ समय बाद यह दर्द सुजन मे बदल जाता है जो कई दिनो तक बना रहता है इसलिए इसे बिछु घास नाम दिया गया है।

 

#उत्तराखंड के अलावा और कहा पाया जाता है

बिछु घास जिसे अंग्रेज़ी में Urtica Dioica भी कहा जाता है। उत्तराखंड के अलावा कश्मीर, नेपाल, एशिया, यूरोप, नॉर्थ अफ़्रीका, नॉर्थ अमेरिका जैसे देशों में भी यह घास पाई जाती है परंतु हो सकता है वहाँ इस घास को किसी और नाम से जाना जाता हो।

#आयुर्वेद व उपचार में सहायक

आयुर्वेद में इस घास को बिछु-बूटी कहा जाता है। आयुर्वेद में इस घास को कई रोगों की दवाइयों के रूप में उपयोग में लाया जाता है और जिन रोगों में यह बूटी अमृत सिद्ध होती है उनके नाम है मधुमेह, गाठिया, पित्त, तेज़ बुखार, दस्त, चोट या मोच, टी. बी जैसी बीमारियों के लिए इस घास की जड़ो का उपयोग किया जाता है।

 

 

#पहाड़ियों का मुख्य भोजन है कंड़ाली (बिछुघास)

आमतौर पर यह सुनने में थोड़ा अजीब से प्रतीत होता है परंतु उत्तराखंड में बिछु घास का साग (कंड़ाली, सियूँण का साग) स्थानीय लोग के पसंदित भोजन में से एक है। उत्तराखंड में बिछु घास से बना साग चाहे छोटे हो या बड़े हर वर्ग के लोग बड़े ही चाव से खाते है। बिछु घास को ‘चिमटे’ की सहायता से ही तोड़ा जाता है। इसके पश्चात इसे ग़र्म पानी में उबाला जाता है जिससे इसके काँटे नष्ट हो जाते है और इस प्रकिया के बाद इसका साग बनाया जाता है। पहाड़ों मे सर्दियों के मौसम में इस साग का सेवन अधिक किया जाता है।

यदि आपने भी  बिछुघास (कंड़ाली, सियूँण) के साग का स्वाद चखा है तो अपना अनुभव हमारे साथ ज़रूर साँझा करें। 🙏🏻धन्यवाद 🙏🏻