chani outskirts home in uttarakhand

 

एक समय वो भी हुआ करता था जब उत्तराखंड के स्थानीय लोग कुछ महीनो के लिए अपने परिवार व अपने पालतू जानवरो के साथ छानी ( डांडो ) में रहने चले जाया करते थे। यह समय ४ से ५ महीनो का हुआ करता था । पशुओं के चारे व खेती के लिए उत्तराखंडी किसान अपने गाँव से दूर छानी में कुछ महीने गुज़ारा करते थे । आप और हम में से भी कई उत्तराखंडियो ने भी अपने परिवार के साथ छानी ( डांडो ) में यह समय गुज़ारा होगा परंतु अफ़सोस की बात है आज की शहरों में रह रही पीढ़ी इस बात से अवगत नहीं है और पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड के गाँव अब इस जीवन के पुराने क्षणो को भी भूलते जा रहे है।

#डांडो की छेडी ( मरोड़ी )

उत्तराखंड के लोगों व पहाड़ों में जीवन बसर कितना मुश्किल हुआ करता था इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है। कुछ महीनो तक परिवार व जानवरो के साथ छानी में बनाए कच्चे घरो में रहना जो की घास और लकड़ियों के बने हुआ करते थे तो कई मिट्टी पत्थरों से बने घरों में रहा करते थे जंगलो में बने इन घरों को स्थानीय लोगों द्वारा अलग अलग नाम से जाना जाता है। गढ़वाल में इन कच्चे घरों को छेडी व मरेडी कहा जाता है।

 

#घंटियो से गूँज होता था जंगलो का वातावरण

यह समय ऐसा हुआ करता था जब जंगलो का शांत वातावरण चरने गए हुए जानवरो ( गाय, भैंस, बकरियो ) के गले में बंधी घंटियो से गूँज उठता था तो साथ ही कई चरवाहे अपनी बाँसुरी की मधुर धुन से वातावरण रमणीय बना देते थे। जानवरो के गले में घंटिया बंधने का यह कारण हुआ करता था यदि कोई पालतू जानवर जंगलो में चरते चरते भटक जाए तो गले में बंधी घंटी की आवाज़ से उसे दूँढा जा सके।

ghasiyari

 

#घसेरियो के खुदेड गीत

घसेरियो के खुदेड गीत अर्थ है जिस तरह आज के समय में मनोरंजन के लिए हम मोबाइल व टी. वी का उपयोग कर लिया करते है उसी प्रकार उस समय जब जंगलो में पहाड़ों की नारियाँ खेती के काम किया करती थी तब वे कभी कबार आपस में स्थानीय पारम्परिक गीत गाया करती थी ये गीत बहुत ही सवेदनशील व दिल को छू जाने वाले हुआ करते थे। जिसे घसेरियो के खुदेड गीत कहा जाता है।

धूवाली द्वारा अनुमान लगाई जाती थी मानवी बस्ती

जंगलो में परिवार व जानवर के संरक्षण के लिए घरों के जानवरो के पास धूवाली लगाई जाती थी। घूवाली अर्थात सूखे घास पत्तों को जलाया जाता था जिससे निकलने वाले धुएँ के कारण जंगलो के कीड़े मकोड़े घरों व जानवरो से दूर रहा करते थे और ये तरह से एक साधन भी था मानवी बस्ती पहचानने का जहाँ मनुष्य रहते थे वहाँ वो धुवाली अवश्य लगता था।

यदि आपने या आपके अपनो ने भी पहाड़ों में ऐसे दिन गुज़ारे है तो अपना अनुभव ज़रूर बाँटे।।🙏🏻धन्यवाद 🙏🏻