यदि कभी ऐसा हो की हमारी महीने भर की जमा पूँजी कही खो जाए तो क्या करेंगे आप ?? जी हाँ कुछ इसी प्रकार की घटना पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड के किसानो के साथ होती आ रही है। उत्तराखंड के गाँव गाँव में जंगली जानवरो का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है, जो कि किसानो की खेती को बहुत नुक़सान कर रहे है। एक किसान अपनी खेती के लिए ख़ून पसीना एक कर देता हैं। बैंकों व साहूकारों से क़र्ज़ ले कर अपनी सारी जान उस खेती में लगा देते है जहाँ से वे एक अच्छी फ़सलो की उपज की उम्मीद करता है ,परंतु होता क्या है कई बार प्राकृतिक आपदाओं या फिर जंगली जानवरो के फ़सलो को नुक़सान पहुँचाने के कारण किसानो की लम्बे समय की कठोर मेहनत नष्ट हो जाती है। खैर प्राकृतिक आपदाओं को रोक पाना तो मनुष्य के नियंत्रण में नही है परंतु जंगली जानवरो को नियंत्रित करना तो मनुष्य के वश में है। आज केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि भारत का हर किसान परिवार इस तरह की परेशानी में घिरा है। वास्तविकता यह है की आज भारतीय किसान इन सभी परस्तिथियो में इतना उलझ चुका है की आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाता है।

 

#पलायन का असर

यदि उत्तराखंड की बात की जाएँ तो वहाँ के स्थानीय किसानो का मानना है दिन प्रतिदिन बंदर व भालुओं का खेतों में आतंक बढ़ता जा रहा है। जिससे उनकी फ़सलो को बढ़े स्तर पर नुक़सान होता है। उनका कहना है ऐसा नहीं है कि जानवर पहली बार जंगल छोड़ मानवी बस्ती की तरफ़ आए हो वे पहले भी आया करते थे , परंतु अब यह गतिविधियाँ काफ़ी बढ़ चुकी है । इसके कई कारण हो सकते है लेकिन मुख्य कारण पलायन को मानते हुए वे कहते है की आज से १० वर्षों पूर्व उत्तराखंड के गाँव गाँव में मानवी आबादी घनी हुआ करती थी परन्तु अफ़सोस आज लोग सुख सुविधाओं व अनेको कारणो के चलते शहरो की तरफ़ पलायन कर चुके है। घरों घरों में ताले लगे है और विस्तृत बस्तियाँ सीमित हो चुकी है जिसके चलते अब जंगली जानवरो की कूच निडरता पूर्वक बस्तियों की और होने लगी है।

 

#जंगलो पर अतिक्रमण का प्रभाव

जिस तेज़ी से जंगलो पर अतिक्रमण हो रहा है उसका कही ना कही प्रभाव जंगली जानवरो पर पड़ रहा है। मनुष्यों ने अपनी सुविधाओं हेतु जंगलों की कटाई करना शुरू किया और धीरे धीरे जंगल कट कर बस्ती में तब्दील होते गए परंतु उनका क्या जिनका जीवन ही जंगलो में हो , फिर भला वे जीव कहा जाए? जिसका परिणाम यह हो रहा है कि आज वे जानवर अपने जीवन बसर के लिए खाने की तलाश में बस्तियों की तरफ़ बढ़ रहे है। इन कारणो के चलते कभी ये जानवर किसानो की फसले नष्ट कर रहे है तो कई बार गुलदारों का बढ़ता आक्रमण लोगों की जान तक ले रहा है।

#इस प्रकार दी जाए किसानो को सहयता

आई ॰आई ॰टी ( मद्रास ) के द रुरल टेक्नोलॉजी एक्शन ग्रूप फ़ॉर तमिलनाड़ू के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा संवेदनशील यंत्र तैयार किया है जो की भविष्य में किसानो के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है। इस उपकरण को आई॰आई॰ टी के दो छात्रों ‘ एस.सरथ ‘ व ‘ रवि खत्री ‘ ने मिलकर तैयार किया है। इस यंत्र में लगे अलार्म व लाइट के ज़रिए खेतों में हो रही जानवरो की गतिविधियों की जानकारी की सूचना से किसनो को सतर्क किया जा सकता है। इस उपकरण में ‘ पैसिव इन्फ़्रारेड ‘ व ‘ माइक्रोवेव ‘ नाम के दो सेंसर लगे है। फ़िलहाल यह यंत्र खेतों में केवल ५ से १० किलोमीटर की दूरी तक लगाए जा सकते है परंतु इसकी कार्यक्षमता को बढाने के विषय पर काम किया जा रहा है। उम्मीद है जल्द ही हमारे किसान इस उपकरण का उपयोग कर पाएगे।

पलायन और जंगली जानवरो के बीच फँसे गरीब किसानो की समस्या को सुलझाने से सम्भंधित अगर कोई उपाय है तो आप अपनी राय कमेंट के द्वारा हम तक साँझा कर सकते हैं।

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