कई वर्षों पूर्व उत्तराखंड के कई क्रांतिकारियो द्वारा भारत सरकार के समक्ष एक माँग रखी गई। यह माँग थी एक अलग राज्य की, यह लड़ाई थी अपने अधिकारो की और लम्बे संघर्षो के बाद वर्ष ९ नवम्बर २००० को भाजपा सरकार द्वारा उत्तरप्रदेश राज्य से उत्तरांचल नाम के रूप में एक राज्य को विभाजित किया गया। २७ राज्य के रूप में विभाजित हुए इस राज्य की अस्थाई राजधानी देहरादून को घोषित किया गया। देहरादून को अस्थाई राजधानी चुनने के पीछे तमाम सलाहकारों व विशेषज्ञों की राय यह थी की देहरादून केंद्रीय आबादी व प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित स्थान था। राज्य गठन के समय देहरादून की आबादी ठीक ठाक पाई गई साथ ही केंद्रीय राजधानी दिल्ली से देहरादून की दूरी कम थी ऐसे कई विषयों पर विचार करते हुए देहरादून को उत्तराखंड की राजधानी के रूप में चुना गया। लम्बे समय के बाद वर्ष २०१४ में उत्तराखंड विधान सभा द्वारा २ से ९ जून तक चर्चा की गई जिसमें ग़ैरसैंण को उत्तराखंड की भविष्य स्थाई राजधानी बनाने पर विचार किया गया।

#ग़ैरसैंण विषयी संक्षिप्त जानकारी

उत्तराखंड के विभाजन के साथ ही ‘ ग़ैरसैंण ‘ को उत्तराखंड की राजधानी के रूप में देखना उन तमाम क्रांतिकारियो का सपना रहा था जिन्होंने भी इस राज्य के हित में अपने प्राणो की आहुति दी थी। वर्तमान उत्तराखंड की राजधानी ‘देहरादून ‘ से ‘ ग़ैरसैंण ‘ की दूरी २५० किलोमीटर की है। ग़ैरसैंण उत्तराखंड के चमोली जिले का एक नगर व ‘ नगर पंचायत’  है। दूधोत्तोली सीमा के पूर्व स्थित ग़ैरसैंण गढ़वाल और कुमाऊँ विभागों (मंडल) को जोड़ने का कार्य करता है। एक प्रकार से देखा जाए तो यह नगर दो सीमाओं के भूभागो ( कुमाऊँ और गढ़वाल ) मंडलो को आपस में जोडे रखने के लिए पुल का काम करता आ रहा है। अफ़सोस इस बात का है कि पहाड़ों के बीच बसे इस नगर में आज भी कई बुनियादी मूलभूत सुविधाओं का आभाव है ।

 

#ग़ैरसैंण के राजधानी ना बन पाने के कारण

विकास के नाम पर किए गए नेताओ के बडे – बडे वादे जमीनी स्तर पर कितने कारगर होते है। इस बात से तो हम भलीभाँति वाक़िफ़ है। अब तक ग़ैरसैंण को राजधानी ना बनाने के पीछे उत्तराखंड सरकार का कहना है कि वहाँ बुनियादी ज़रूरतों का अभाव है। अपने एक बयान में वर्तमान उत्तराखंड मुख्यमंत्री ‘ त्रिवेंद्र रावत ‘ जी का कहना था की ग़ैरसैंण नगर में पानी का अपूर्ति जैसी समस्या है। इस विषय पर कार्य किया जा रहा है और समस्या का समाधान होते ही ग़ैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में घोषित किया जाएगा। यदि नेताओ द्वारा इस प्रकार की निराशजनक प्रतिक्रिया मिलती है तो यह बड़े अफ़सोस की बात है क्यूँकि अपने राज्य का अपने देश का सही ढंग से विकास हो सके तभी तो जनता नेताओ को अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनती है, परंतु वास्तविकता यह है की चुनाव समाप्त होते ही नेताओ के विकास सम्बंधी सारे वादे धरे के धरे रह जाते है।

#ग़ैरसैंण को लेकर उत्तराखंडीयो की राय

लगभग हर उत्तराखंडवासी चाहता है। ग़ैरसैंण उत्तराखंड की स्थाई राजधानी हो, स्थानीय लोगों का मानना है उत्तराखंड की राजधानी पहाड़ों में होनी चाहिए। यदि नेताओ का कार्य पूर्ण रूप से पहाड़ों में रह कर होगा, तो उन्हें भी यह अनुभव होगा कि पहाड़ों की स्थिति पिछले १७ साल में कितनी बदली है, और तब तो कम से कम पहाड़ों के एक एक गाँव का विकास हो पाएगा और लोगों को रोज़गार के लिए यहाँ वहाँ नहीं भटकना पड़ेगा। उम्मीद है सरकार इस विषय पर जल्द ही गम्भीरता से विचार करेगी । ग़ैरसैंण को स्थाई राजधानी बनने के विषय में आप लोगो की क्या राय है कॉमेंट के माध्यम से हमें ज़रूर बताएँ।।

गैरसैंण को राजधानी बनाने की परिकल्पना से लेकर जमीनी हक़ीकत बांया करता ये वीडियो।

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