उत्तराखंड राज्य ‘ देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाला राज्य आज सब से अधिक पलायन की मार झेल रहे राज्यों में से एक बन चुका है। आज ना जाने यहाँ कितने पुरख़ो के बसाए गाँव व घर ख़ाली हो चुके है। जहाँ लोग प्राथमिक सुविधा की खोज में बड़ी तेज़ी से अपने घरों , गाँवों को छोड़ने को मजबूर हो रहे है तो वही कुछ बचे कूचे स्थानीय लोग जो स्वयं रोज़गार हेतु कुछ करना चाहते है उन्हे राज्य सरकार द्वारा कोई सहायता नहीं दी जा रही है। क्या इस प्रकार उत्तराखंड सरकार अपने राज्य की जनता के हित मे काम कर रही है या फिर जनता के समस्याओ से दूर अपने आवासों व दफ़्तरों में बैठ स्तिथियो के और गंभीर होने का इंतज़ार कर रही है।

#स्थापन से लेकर अब तक कोई कठोर सुधार नहीं

९ नवम्बर २००० वर्ष को उत्तरप्रदेश से अलग हुए उत्तराखंड राज्य को आज लगभग १७ वर्ष हो चुके है। १३ ज़िल्हो वाले इस राज्य के लगभग हर गाँव की समस्याएँ एक जैसी ही है। आज भी गाँव व वहाँ रहने वाले स्थानीय लोग अपने हक़ों व प्रथमिक ज़रूरतों के लिए रोज़ लड़ रहे है तो ना जाने कितने बेक़सूर सरकार के भ्रष्ट व नकारे नेताओ की लालच के चलते ख़ुद मौत के शिकार हो रहे है। आज भी कई गाँव शिक्षा ,स्वास्थ, रोज़गार व पक्की सड़को जैसी प्राथमिक ज़रूरतों से भी वंचित है। आज भी कई स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षको का अभाव है वही दूसरी और अस्पताल व सड़कों की ख़स्ता हालत की वजह से पिछले दिनो जौनसार क्षेत्र की एक महिला का अस्पताल मे डॉक्टर मौजूद ना होने के कारण घर लौटेते वक़्त अपने ही इलाक़े के पुल पर बच्चे को जन्म दे दिया था। तो आय दिन उत्तराखंड की किसी ना किसी सड़क पर दुर्घटना की ख़बरें मिलती रहती है और इन दर्दनीय दुर्घटनाओं में लोगों को अपने प्रियजन खोने पड़ते है।

#चुनाओ तक सीमित है नेताओ के वादे

अब तो श्याद हर बच्चा इस बात से वाक़िफ़ हो चुका होगा की नेताओ की राजनीति में किए जाने वाले वादे ज़मीनी स्तर पर कहा तक अमल किए जाते है। चुनावी दौर में जहाँ नेता अपनी आयु से ३ गुनी ऊर्जा से सक्रिय होते हैं वही सत्ता में आते ही उनकी यह ऊर्जा निष्क्रिया हो जाती है। ख़ैर हर बार विकास और सुधार का लालच देकर वोट हासिल कर लेना भारतीय नेताओ की फ़ितरत में शामिल हो चुका है तो वही भोली भाली जानता का हरबार बेवक़ूफ़ बनना रीत सी हो गई है।

#सरकारी भ्रष्ट प्रणाली से परेशान स्थानीय निवासी

उत्तराखंड में टिहरी जिले के गौनगढ़ पट्टी में रहने वाले ‘ गौतम सिंह नेगी ‘ जी अपनी असहाय स्तिथी बताते हुए फूट फूट कर रो पड़े उनका कहना है उन्होंने लगभग ८ ,९ वर्ष मुंबई के होटलों में काम किया ५ ,६ वर्ष विदेश में काम के पश्चात आज जब वे अपने उत्तराखंड में लौट कर अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करने की चाह से टिहरी क्षेत्र के ‘ चमियाला ‘ बाज़ार नामक स्थान पर गौशाला खोल कर गौ सेवा व स्वयम् रोज़गार कर रहे थे तो सरकार द्वारा उन्हें कोई सहयात नहीं मिल रही है। दूसरी ओर सरकारी बाबुओं व बैंक कर्मचारियों द्वारा उनके साथ बार बार सहयता के नाम पर दुर्वव्यवहार किया जा रहा है। आज हालत यह है कि घर गृहस्ती वाला यह स्थानीय निवासी अपने ही राज्य में सरकार की ख़स्ता व भ्रष्ट प्रणाली के सामने ख़ुद को अकेला व कमज़ोर महसूस करने लगा है। जहाँ प्रथमिक ज़रूरतों का सामना करना पहाडी जीवनशैली का हिस्सा है वही सरकार द्वारा सहयता के रूप में मिलता रव्या अत्यंत निराशा जनक है। जिससे स्थानीय लोगों का स्वयं रोज़गार व नई व्यवसाय के प्रति रुझान ख़त्म होता जा रहा है। इस विड़ीयो की सहायता से आप उत्तराखंड के एक आम स्थानीय व्यक्ति की स्तिथी का अनुमान लगा सकते है। इस विड़ीयो को अधिक से अधिक शेयर करे और सोती सरकार को नींद से जगाने की एक पहल करे ।।

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