उत्तराखंड पहाड़ी राज्य है जिसके कारण यहाँ के लोगों की जीवन शैली काफ़ी संघर्षिल व परिश्रमी होती है, और ऐसी जीवन शैली को जीने के लिए आवश्यक होता है प्रचुर मात्रा में पौष्टिक आहार जो की उत्तराखंड के लोगों को प्रकृति की देन के रूप में उत्तराखंड के जंगलो में ही भरपूर मात्रा में प्राप्त हो जाते है। पूर्ण जैविक रूप मे उगने वाली इन फ़सलो में पौष्टिकता परिपूर्ण होने के कारण यहाँ का खानपान स्वास्थ्य के लिए बेहद फ़ायदेमंद होता है। इस लेख के माध्यम से उत्तराखंड के कुछ चर्चित खानपान व उनके स्वास्थ्यवर्धक फ़ायदों के बारे में जानते है।

#सिसौण ( कंड़ाली ) का साग : ‘ साग ‘ शब्द तो आपने अपने खानपान मे सुना ही होगा आमतौर पर अन्य राज्यों में पालक, राई , सरसों का ‘ साग ‘ बनाया और खाया भी जाता है। उसी प्रकार उत्तराखंड में बनाया जाने वाला सिसौण ( कंड़ाली ) का साग पूरे उत्तराखंड में बेहद मशहूर है। इसे आम भाषा में ‘ बिछु घास ‘ कहा जाता है। उत्तराखंड के जंगलो में उगने वाले इस बिछु घास में बेहद काँटे होते है और यदि ग़लती से भी नग्न हाथ से इसका स्पर्श कर लिया जाए, तो हाथ में सुजान आ जाती है इसीलिए इस बात का विशेष ध्यान रखते हुए उत्तराखंड की स्थानीय महिलायें इन्हें बड़ी सावधानी से चिमटे या हाथो में कपड़े लपेट कर जंगलो से तोड़ लाती है।

सिसौण ( कंड़ाली ) के साग बंनाने की विधि : जंगलों से बिछु घास तोड़ कर लाया जाता है। जिसे आग में सेका जाता है तत्पश्चात इसे पानी में उबला जाता है, ऐसा करने से इसके सारे काँटे ख़त्म हो जाते है। इसके बाद इससे साग बनाया जाता है जो की स्वस्थ के लिए फ़ायदेमंद होता है।आयुर्वेद में इस घास को ‘ बिछु बूटी ‘ भी कहा जाता है। आयुर्वेद में इस घास को कई रोगों की दवाइयों के रूप में उपयोग में लाया जाता है और जिन रोगों में यह बूटी अमृत सिद्ध होती है उनके नाम है मधुमेह, गाठिया , पित्त, तेज़ बुखार, दस्त , चोट या मोच , टी. बी जैसी बीमारियों के लिए इस घास की जड़ो का उपयोग किया जाता है।

#फाणू ( डुबुक ) ‘ फाणू ‘ सम्पूर्ण उत्तराखंड में बेहद प्रसिद्ध है। यहाँ गहत (गाथ) नामक दाल से नाया जाता है। गहत की दाल को पानी में ६ से ७ घंटे भिगोया जाता है उसके पश्चात् भीगी गहत (गाथ) की दाल को सिल्वटे पर बारीक पिस कर ‘ फाणू ‘ बनाया जाता था। अब लोग मिक्सर मशीन की सहायता से गहत (गाथ) की दाल को बारीक पिस कर ‘ फाणू ‘ बनाया करते है।आमतौर में उत्तराखंड में ‘ फाणू ‘ दोपहर के भोजन या रात के भोजन में चावल (भात) के साथ खाया जाता है।

#कोदा ( मंडुआ  ) की रोटी :  कोदा की रोटी ‘ सम्पूर्ण उत्तराखंड में बेहद प्रिय भोजन में से एक है। अन्य राज्यों में इसे ‘ मंडुआ ‘ के नाम से भी जाना जाता है। कोदे की फ़सलो से निकलने वाले दानो की पिसाई कर उसका आटा तैयार किया जाता है और उस आटे से कोदे की रोटी बनाई जाती है वैसे तो कोदे की रोटी का स्वाद सामान्य ही होता है परंतु पहाड़ियों के लिए यह मात्र रोटी ही नहीं बल्कि यह उनके जीवन में ऊर्जा व फुर्ती का संचार करने में सहायक एक महत्वपूर्ण भोजन अंश के रूप में समल्लीत है। स्थानीय लोग अक्सर कोदे की रोटी को चटनी, घी, गुड़ व साग के साथ खाना पसंद करते है। खाद्य विशेषज्ञों की माने तो कोदे में कैल्शियम , विटामिन बी, आयोडीन, लौह तत्व व फ़ास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाए जाते है। इससे बने खाद्यो का प्रतिदिन सेवन करने से हड्डियाँ व दाँत मज़बूत होती है। मधुमेह के रोगियों के लिए कोदा वरदान साबित है। ह्रदय व ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए भी यह एक अच्छा भोजन है।

#भटवाणी : उत्तराखंड में  ‘ भट ‘ की दाल से बनाई जाने वाली ‘ भटवाणी ‘ का स्वाद चखने वाले के लिए यह एक अलग अनुभव है। ‘ भटवाणी ‘ बनाने के पूर्व भट कि दाल को बनाने से पूर्व भुना जाता है। दाल के भून जाने के बाद दाल को सिलवट्टे या मिक्सर मशीन में पिसा जाता है। उत्तराखंड में भटवाणी मुख्यतौर पर चावल (भात) के साथ खाया जाता है।

#पहाड़ी चटनी : चटनी का नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता है तो वही ‘चटनी’ की भारतीय खानपान में एक विशेष भूमिका होती है। हमारे देश के अलग अलग राज्यों के खाने के साथ ‘चटनी’ बनाने के तरीक़ों में भी कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। उत्तराखंड के खानपान में चटनी की अहम भूमिका है। प्रातःकाल के नाश्ते से लेकर रात्रि के भोजन तक में यह समल्लित होता हैं। पुदिना, कच्चे टमाटर, धनिया, नमक, हरा लसुन, हरी मिर्च व निम्बू के मेल से बनी पहाड़ी चटनी का स्वाद किसी भी खाने को एक उच्च स्तर पर ले जाती है।

#झँगोरे की खीर : खाने के शौकिनो की माने तो उनका खाना तब तक पूरा नहीं होता जब तक खाने के अंत में कुछ मीठा ना खाया जाए भोजन के अंत में खाए जाने वाले मिष्ठान को अंग्रेज़ी में डेज़र्ट कहा जाता है। उत्तराखंड में भी मीठे भोजन के रूप में ‘ झँगोरे की खीर ‘ अत्यंत लोकप्रिय है। झँगोरा एक मोटे प्रकार का अनाज होता है जिसे व्रत के दिनो में फलाहार के रूप में भी खाया जाता है। झँगोरे की खीर को झँगोरे , दूध , ड़्र्यफ़्रूटस, चीनी व चिरौंजी से बनाई जाती है। इस खीर का स्वाद इतना लज़ीज़ होता है की वह किसी भी ज़ायक़े को पूरा करने के लिए यह खीर काफ़ी है।

uttarakhand traditional dish arssa

#अरसा  : ‘ अरसा ‘ उत्तराखंड की एक पारम्परिक मिठाई है जो की उत्तराखंड में शादी , विवाह व शुभकार्यों के अवसर मे बनाई जाती है। यह उत्तराखंड के लोगों के पसंदीद ‘ स्नैकस ‘  में से एक है स्थानीय लोग चाय के साथ इसे खाना पसंद करते है। इसे कुछ इस प्रकार बनाया जाता है चावल को ७ से ८ घंटे भिगोया जाता है इसके बाद उखल्यारी (ओखली) की सहायता से इसे दरदरा (मोटा) पिसा जाता है। दूसरे बर्तन में ग़र्म पानी में गुड डालकर उसकी चासनी तैयार की जाती है। पिसे चावल को गुड की चासनी में मिला कर ‘ ताक ‘ तैयार की जाती है। ताक को ठंडा किया जाता है। ताक के ठंडे होने पर मिश्रण की गोलियाँ बनाई जाती है और स्वादिष्ट अरसा परोसने के लिए तैयार हो जाता  है।

यदि आप भी उत्तराखंड से है तो हमें भी यह ज़रूर बताए की इन सभी उत्तराखंडी प्रसिद्ध व्यंजनो में से आपकी प्रसंदीद व्यंजन कौन सा है।

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